Jai Bhim Movie REVIEW In Hindi

 

Jai Bhim Movie REVIEW In Hindi

लोक कानून ये वो चीज है जिसकी वजह से हम करोड़ों अरबों की पॉपुलेशन के बाद भी शांति से चैन की नींद सो जाते हैं रात को कुछ गलत हुआ तो हमारा कानून हमें बचा लेगा वह क्या होगा अगर वो कानून ही किसी इंसान को बर्बाद करने का वैपन बन जाए। सबसे खतरनाक हथियार जो इंसान को इंसान नहीं जानवर की तरह जिंदगी जीने को मजबूर कर दे। जय भीम एक ऐसी सिनेमा का सबसे बढ़िया इस्तमाल करती है सोसायटी के रियल इश्यूज को फोकस में लाने के लिए सच को तमाचे की तरह मार दिया जाता है। मेरे आपके चेहरे पर सबसे बढ़िया बात ये है कि उनको हिंदी डबिंग में भी अमेजन प्राइम पर ओरिजिनल लैंग्वेज तमिल तेलगू वर्जन भी रिलीज हुआ है रिव्यूज समझते हैं ये तरीके का नाम है। जब किसी इंसान को पुलिस या कोई ऑफिशल बॉडी बिना किसी सबूत के लीगली अरेस्ट कर लेती है तब इस के थ्रू कोर्ट खुद करता है। पुलिस को उस कोर्ट को उनके सामने प्रेजेंट करने के लिए जल्दी से जल्दी वो भी जिंदा। कहानी में होता कुछ यूं है बट गांव के बड़े आदमी के घर हो जाती है चोरी। शक की सुई सीधा गांव के परिवार में जाती है जो अपना पेट भरने के लिए सांप पकड़ने का काम करते हैं। ये तो सिर्फ शुरूआत है उस घटिया इलीगल प्रॉसेस की जिसमें पुलिस अपनी पावर का गलत इस्तेमाल कमजोर को जबरदस्ती चोर साबित करने के लिए करने लगती है। क्या आदमी क्या औरत हर किसी को कपड़े उतार कर जेल के पीछे डाल कर दिन रात सिर्फ मारा पीटा जाता है ये कबूल करवाने को कि चोरी करना इन छोटी जोत वाले लोगों की आदत है। लालच इनके खून में है। पुलिस का ये सपना पूरा


भी हो जाता अगर एक सच्चा दिल तेज दिमाग लॉयर इस केस को अपने हाथों में ना लेता। चंद रोज ये लॉयर बने जस्टिस के लिए सामने बड़ी हो या छोटी इससे कोई घंटा फर्क नहीं पड़ता। इनके लिए भीमराव अंबेडकर एक फोटो नहीं है। घर में टांगने के लिए अपनी वकालत के बिजनेस को चमकाने के लिए अंबेडकर एक सोच है। पूरी दुनिया को साथ में जोड़कर रखने के लिए बराबरी से कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं। कानून सबके लिए बराबर है। अब इसमें ट्विस्ट कुछ आता है पर चंद रोज का केस लड़ रहे हैं वो अचानक पुलिस स्टेशन से हो जाते हैं गायब पुलिस के लिए क्रिमिनल भागा है तो परिवार के उनका सबकुछ खो गया। बस यहां की राबिया है कॉर्पस की जिसके बाद ऐसे ऐसे छुपे हुए सच बाहर निकलते हैं जो एक केस नहीं बल्कि हजारों लाखों केसों में होने वाली गड़बड़ भेदभाव को एक्सपोज कर देते हैं। देखो जब भी कोई मामूली बिल्कुल नहीं है तुमको आज के टाइम में बनाना जितना इम्पॉर्टेंट है उससे कई गुना मुश्किल भी है हिम्मत चाहिए बॉस। लीगल सिस्टम खुद सोसायटी को आईना दिखाने के लिए संकट में रोज नेचुरल तरीके से बनाया गया है। बट एक एक सीन में आपको शर्म आ जाएगी। खुद के ऊपर बैठा एक ऐसी दुनिया का हिस्सा है जो लोगों को किया समझा जाता है वो किसी उनके सड़ने की वजह से अमीर गरीब का फर्क नॉर्मल है पूरी दुनिया में बड़ी कांच के पर भेदभाव उसका असली चेहरा पूरी तरह एक्सपोज किया गया है। फिल्म एकदम बिना डरे हुए पुलिस से लेकर गारमेंट दोनों पर सवाल उठाए गए हैं। ऐसा टाइम पुलिसवाला हीरो बना के प्रजेंट करता है। हर दूसरी फिल्म लाइक सिंघम से सूर्यवंशी का


पुलिस का एवं फाइट शोकेस करना वो भी एक रियल इंसिडेंट पर बेस्ड कहानी के साथ सबके लिए तालियां तो बनती है बॉस एक्चुअली जो लीगल केस कहानी में दिखाया गया है वो इतना रियलिस्टिक इंट्रस्टिंग है। बड़े दिल दिमाग दोनों पूरी तरह से जुड़ जाते हैं। पहले सीन की शुरुआत से ही कहानी लिखी गई है। स्मार्ट तरीके से सोशल साइट पर होने के बावजूद आपको इंटरटेनमेंट भी मिलेगा प्लस दिमाग लड़ाने के लिए सस्पेंस भी खूब सारा ये उस तरीके का सिनेमा है जो कहानी ही फोन उनका असली हीरो होती है। चेहरे पर मेकअप की दुकान खोलकर कैमरा के सामने डायलॉगबाजी करने के लिए इसमें कोई जगह नहीं है। फिल्म को पास किया गया है सपोर्टिंग रोल लेकिन छोटे छोटे कैरेक्टर्स के लिए वो इतनी रियल परफॉमेंस देते हैं मानो सबकुछ लाइव सीसीटीवी फुटेज चल रहा है आंखों के सामने छोटे छोटे डिटेल्स का ध्यान रखा गया है। एक सीन पर मेधा चावल खिलाए जाते हैं। जेल में बंद लोगों को वो मोटी डाइट कहते क्वालिटी कम पैसों में आते हैं। सस्ते वाले इन सब छोटी छोटी चीजों की वजह से हम जर्मन ऑथेंटिक फील होती है। मजाक में यह रियल फिल्ममेकिंग है। वह सबसे बढ़िया चीज है फिल्म कॉर्टून ड्रामा को बिना बढ़ाए चढ़ाए एकदम नैचुरल तरीके से प्रेजेंट करना व हीरोपंती वाले हीरो की आवाज में इमोशनल भाषणबाजी वो रीयल लाइफ में नहीं चलते क्लास में सूर्या परफॉर्मेंस कहने के लिए बंगाली डाक्टर हैं लेकिन बॉस ही फोन को सिर्फ टीचर सपोर्ट कर रहे हैं।

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